कभी सतरंगी फूल हूँ मैं, कभी धूप कभी धूल हूँ मैं कभी किसी के लिये बेहद ज़रूरी तो कभी बेहद फ़िज़ूल हूँ मैं एहसासों के समुन्दर की तो सिर्फ़ एक बूँद हूँ मैं अपने अन्दर के हलचल को छुपाये एक धुंध हूँ मैं अनजान मौजों में उलझी कोई कश्ती हूँ मैं दिल के मचलने पर आँखों से बाहर आने वाली मस्ती हूँ मैं
खुद से किया कोई अधूरा सवाल हूँ मैं
जानकर भी अनजान लगता कोई ख़याल हूँ मैं
दिल कि दीवारों में कैद कोई चीख हूँ मैं
भरोसे की डगर पर पहली कोई सीख हूँ मैं
suruchi verma
Thursday, June 2, 2011
udaan ke hone me uski taaleem shamil nahi hoti.......
kisi veeraane me baje dhol to bhi wo mehfil nahi hoti......
har mod pe mud jana to aasaan hai lekin.....
har gali raahe manzil nahi hoti.
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