suruchi verma

Tuesday, March 27, 2012


तेरा नाम मैंने पुकारा तो नहीं था
लेकिन तुझसे रूठना गवारा भी नहीं था

सोचा की जी लेंगे तेरे बिन हम
पर पाया कोई तुझसे प्यारा ही नहीं था

आवाज़ दी किसी ने जब कभी तो
लगा कहीं ये तेरा इशारा तो नहीं था

हालात अब और बिगड़ चुके हैं
दोनों में से किसी ने इन्हें संवारा जो नहीं था

एक बार जिस पे यकीन था हमको 
फिर वो एहसास दोबारा तो नहीं था

रब ने छीन लिया है जो हमसे
वो लम्हा कभी भी हमारा तो नहीं था

डूबते चले गये हम पछतावे के दरिया मे
राहतों का कोइ किनारा जो नही था

तेरा ज़िक्र भी आंखों को नम कर जाता है
नज़रों से तुमको उतारा तो नही था


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ख्वाब इन आँखों ने दिखलाये बहुत थे
वादे भी लेकिन निभाए बहुत थे

कभी इंतज़ार तो कभी ऐतबार पे ठहर जाते थे
दिल के अरमान पिघलाए बहुत थे

वजह कोई ख़ास थी तो नहीं लेकिन
बेवजह ये पलकें भिगाए बहुत थे

राज़ छुपाये बैठे थे लेकिन
किस्से खामोशियों के सुनाये बहुत थे

वो नासमझ नाराजगी की खातिर
दिल की बातो को छुपाये बहुत थे

खुशियाँ जो हलचल साथ लायी तो
अन्दर का नूर छलकाए बहुत थे

मन हुआ जो उदास कभी तो
नजारों से दिल ये बहलाए बहुत थे

विशवास भी इनसे नाप ले कोई
कसौटियों पे खुद को आजमाए बहुत थे

अरमान जो पूरे नहीं हो पाए उनको
आसुओं की बारिश में जलाए बहुत थे

बेखबर से किसी पल को समेट-ते
रातों के लम्हे गंवाए बहुत थे

खूबसूरत छलावा बनके कभी तो
दुनिया को यूँही सताए बहुत थे

उलझे हुए रिश्ते में प्यार की एक झलक बनकर
हज़ारों के झगडे सुलझाये बहुत थे

खामोशियों से लड़कर अकसर इन्होने
दिल के अरमान समझाए बहुत थे