कभी सतरंगी फूल हूँ मैं, कभी धूप कभी धूल हूँ मैं कभी किसी के लिये बेहद ज़रूरी तो कभी बेहद फ़िज़ूल हूँ मैं एहसासों के समुन्दर की तो सिर्फ़ एक बूँद हूँ मैं अपने अन्दर के हलचल को छुपाये एक धुंध हूँ मैं अनजान मौजों में उलझी कोई कश्ती हूँ मैं दिल के मचलने पर आँखों से बाहर आने वाली मस्ती हूँ मैं
खुद से किया कोई अधूरा सवाल हूँ मैं
जानकर भी अनजान लगता कोई ख़याल हूँ मैं
दिल कि दीवारों में कैद कोई चीख हूँ मैं
भरोसे की डगर पर पहली कोई सीख हूँ मैं
suruchi verma
Monday, September 12, 2011
aane wale pal pe aitbaar kar nahi sakte.....
kyun khud apne sapne se pyar kar nahi sakte.......
waah waah!!!!!!!!!!!!1
ReplyDelete